ग़ज़ा सिटी से फ़लस्तीनियों का दर्दनाक पलायन, इंसानियत की हार

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

इसराइल द्वारा ग़ज़ा सिटी पर ज़मीनी हमला शुरू किए जाने के एक दिन बाद, वहां से हज़ारों फ़लस्तीनी नागरिकों का पलायन शुरू हो गया है। ट्रकों, साइकिलों और पैदल चलती भीड़… जिनके पास कोई ठिकाना नहीं, कोई सुरक्षा नहीं।
शहर अब केवल खंडहरों में तब्दील हो रहा है।

इसराइली सैन्य दावा: “हमास का आख़िरी गढ़”

इसराइली सेना का दावा है कि उन्होंने दो दिनों में 150 से अधिक “आतंकवादी ठिकानों” पर हमला किया है।
उनका लक्ष्य – हमास के 3000 लड़ाकों को हराना, बंधकों को छुड़ाना लेकिन इस सैन्य ऑपरेशन के बीच सैकड़ों नागरिक, जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुज़ुर्ग शामिल हैं, सीधे युद्ध की चपेट में आ रहे हैं।

अस्पताल तक नहीं बचे

हमास-प्रशासित ग़ज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय ने दावा किया है कि तीन अलग-अलग हमलों में एक बच्चों के अस्पताल को निशाना बनाया गया। इससे अस्पताल के आधे मरीज़ और उनके परिजन जान बचाकर भागने को मजबूर हुए। बमबारी के दौरान अस्पताल की खिड़कियाँ और उपकरण तबाह हो गए।

इसराइली सेना का कहना है कि वे इन आरोपों की जांच कर रहे हैं।

जब इंसानियत ही मर जाए

ग़ज़ा की सड़कों पर डर है, अस्पतालों में आँसू हैं, बचाव शिविरों में भूख है, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी कचोट रही है। यह केवल एक युद्ध नहीं — यह मानवता की अंतिम साँसे हैं।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया कहां है?

संयुक्त राष्ट्र और रेड क्रॉस जैसी संस्थाएं मानवीय गलियारे की मांग कर रही हैं, लेकिन जमीन पर बमों की आवाज़ मदद की पुकार को दबा रही है।
ग़ज़ा में हालात इतने भयावह हैं कि पीने का पानी, बिजली, और दवाइयों तक की किल्लत हो चुकी है।

क्या रह गया है अब?

इस युद्ध में कौन जीता और कौन हारा — इसका फ़ैसला बाद में होगा। लेकिन अभी… माँओं ने अपने बच्चे खोए हैं, अस्पतालों ने अपने मरीज़, और दुनिया ने अपनी संवेदना।

Related posts

Leave a Comment